Saturday, April 27, 2019

दोस्त भी है, दुश्मन भी 'कोलेस्ट्रॉल' !

राजीव शर्मा / बोधि श्री 
देश में रोज हजारों लोग लाइलाज बीमारियों के नाम पर मौत के मुंह में चले जाते हैं। लेकिन इन बीमारियों के साथ कोई न कोई ऐसी वजह जरूर जुड़ी होती है जिसका समय रहते निदान कर लिया जाए तो इस तरह मौत का निवाला बनने से बचा जा सकता है। दिल की बीमारी से जुड़ी ऐसी ही एक मुश्किल है कोलेस्ट्राॅल। इसे यदि दिल का सबसे बड़ा दुश्मन कहा जाए तो गलत नहीं होगा। आज भी हमारे देश में दिल की बीमारी से मरने वाले हजारों लोगों को यह पता नहीं होता कि आखिर ये कोलेस्ट्राॅल है क्या बला !

कोलेस्ट्राल एक वसा या वसा जैसी चीज है जो हमारे खून में प्रसारित होती है। कम लोगों को पता है कि शरीर में कुछ मात्रा में इसकी मौजूदगी शारीरिक क्रियाओं के लिए अत्यंत जरूरी है। अगर हम सीधे भोजन से इसे नहीं प्राप्त कर पाते, तो हमारा लिवर इसे बनाकर देता है। यह हार्मोन, विटामिन-डी और अन्य ऐसी चीजें बनाने के लिए जिससे भोजन ठीक से पच सके, जरूरी है। शरीर में कोलेस्ट्रॉल न हो तो शरीर की न जाने कितनी प्रक्रियाएं ठप हो सकती हैं। इस तरह कोलेस्ट्रॉल इंसान का जरूरी दोस्त भी है।

फिर इसे स्वास्थ्य का दुश्मन क्यों करार दिया जाता है? इसे समझने के लिए हमें जानना होगा कि कोलेस्ट्राॅल कई प्रकार के होते हैं। इनमें से एक है--कम घनत्व वाला जिसका मेडिकल नाम है 'लो डेंसिटी लिपोप्रोटीन' (Low Density Lipo-protein) जिसे आम बोलचाल में  LDL कहा जाता है। इसे ही हानिकारक या बैड कोलेस्ट्राॅल माना जाता है। यही कोलेस्ट्राॅल दिल का दुश्मन है। इसका स्तर जब हमारी रक्त धमनियों में बढ़ जाता है तो वह दिल की बीमारियों की वजह बनता है। इसी तरह वैरी लौ डेंसिटी लिपोप्रोटीन (VLDL) होती हैं जो और भी खतरनाक होती हैं। इसके अलावा रक्त में कोलेस्ट्रॉल से मिलती-जुलती एक अन्य चीज होती है, ट्राइग्लिसराइड्स (Triglycerides) । यह भी हृदय  रोग को आमंत्रित करती है। एक अन्य कोलेस्ट्राॅल होता है--उच्च घनत्व वाला जिसका मेडिकल नाम है 'हाई डेंसिटी लिपोप्रोटीन' यानी 'HDL'। इसे ही अच्छा या गुड कोलेस्ट्राॅल कहते हैं।  

यदि आपके खून में एलडीएल का स्तर बहुत अधिक है तो यह आपकी धमनियों में जमा होता जाता है। इससे धमनियां संकरी हो जाती हैं जिससे रक्त प्रवाह कम हो जाता है जिससे पर्याप्त ऑक्सीजन आपके दिल की मांसपेशियों तक नहीं पहुंच पाती जिससे दिल का दौरा पड़ सकता है। यदि ब्रेन में ऐसा हो तो आपको 'स्ट्रोक' (मस्तिष्काघात) हो सकता है। यदि कुछ मिनट भी मस्तिष्क के किसी हिस्से में रक्त का प्रवाह रुक जाये तो उसके गंभीर नतीजे होते हैं।  

आम तौर पर डाक्टर रक्त में कोलेस्ट्राॅल की मात्रा जानने के लिए 'लिपिड प्रोफाइल' (Lipid Profile) नाम का टेस्ट करवाते हैं। यह टेस्ट रक्त में टोटल कोलेस्ट्रॉल (Total Cholesterol), वीएलडीएल (Very Low Density Lipo-protein), एलडीएल (Low Density Lipo-protein), एचडीएल (High Density Lipo-protein) की मात्रा उजागर करता है। सेहतमंद होने की निशानी है कुल कोलेस्ट्राॅल 200 मिलीग्राम प्रति डेसीलिटर से कम हो। कुल कोलेस्ट्रॉल से अधिक इस बात का महत्व है कि खराब कोलेस्ट्राॅल और अच्छे कोलेस्ट्रॉल का अनुपात कैसा है। यदि अच्छे कोलेस्ट्रॉल की मात्रा अधिक है तो आपका दिल सुरक्षित है।

सवाल यह है कि दिल के दुश्मन, बुरे कोलेस्ट्राॅल से बचा कैसे जाए। एहतियात के तौर पर बीस साल की उम्र पार कर चुके हर इंसान को हर पांच साल में Lipid Profile Test करा लेना चाहिए। पुरुषों को 45 की उम्र पार करने के बाद और महिलाओं को 55 की उम्र पार करने के बाद तो यह टेस्ट हर साल करवाना चाहिए। 

कोलेस्ट्रॉल ज्यादा होने की कई वजहें होती हैं जैसे अधिक तैलीय आहार, शारीरिक गतिविधियों की कमी, आरामतलब जिंदगी, धूम्रपान, मद्यपान आदि इनके अलावा अनुवांशिकता भी एक बड़ी वजह है। आहार में वसा की मात्रा सीमित करने और प्रतिदिन कम-से-कम 30 मिनट कसरत या तेज चाल से भ्रमण करने से समुचित मात्रा में  अच्छा कोलेस्ट्रॉल बन जाता है। सिगरेट पीते हैं तो उसे तुरंत छोड़ दें। मांसाहार में रेड मीट (भेड़, बकरी, बीफ, पोर्क आदि लाल रंग के मांस) तुरंत छोड़ दें, अगर लेना भी हो, तो व्हाइट मीट (अंडे, चिकन, मछली) चल सकता है। 

नियमतः साबुत अनाज, फल और सब्जियों का अधिक सेवन करें।


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