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Friday, April 19, 2019

खबरदार कोई सुन न ले, अस्पताल में मौत का नया सौदागर आया है !

राजीव शर्मा / बोधि श्री

विगत 6 अप्रैल, 2019 को न्यूयार्क टाइम्स में छपी एक खबर चिकित्सा जगत में हड़कंप की वजह बन गई। इसकी वजह यह कि एक फंगस जो दवा प्रतिरोधी होता जा रहा है, जिससे संक्रमित आधे लोग शर्तिया तौर पर मर जाते हैं और जो एक-के-बाद-एक दुनिया भर के अस्पतालों में फैलता जा रहा है, फिर भी उसके इस हमले को लगभग गोपनीय रखा जा रहा है।

न्यूयार्क टाइम्स की उक्त रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल मई में एक बुजुर्ग आदमी को पेट की सर्जरी के लिए माउंट सिनाई अस्पताल की ब्रुकलिन शाखा में भर्ती कराया गया था। यह व्यक्ति एक ऐसे फंगस से संक्रमित था जो किसी भी उपलब्ध दवा से ठीक नहीं हो सकता था। यह फंगस था 'कैंडिडा ऑरिस' (Candida auris)। इसका यह नाम इसलिए रखा गया क्योंकि यह पहली बार 2009 में जापान में एक मरीज के कान में पाया गया था। 'ऑरिस' का ग्रीक भाषा में मतलब है कान। 

'कैंडिडा ऑरिस' HIV/AIDS से ज्यादा खतरनाक है क्योंकि यह सप्ताह भर में ही किसी व्यक्ति के इम्यून सिस्टम को तबाह कर सकता है। खतरा यह है कि कहीं यह दवा-प्रतिरोधी फंगस पूरी दुनिया को अपनी गिरफ़्त में न ले ले। पिछले पांच साल में इस फंगस ने वेनेजुएला के एक अस्पताल की नवजात (Neonatal) यूनिट और स्पेन के एक पूरे अस्पताल को अपना निशाना बनाया। इसकी वजह से प्रतिष्ठित ब्रिटिश मेडिकल सेंटर को तो अपना 'आईसीयू' तक बंद करना पड़ा। यह फंगस अमेरिका में न्यूयार्क और न्यूजर्सी तक जा पहुंचा और वहां के 'सेंटर्स फॉर डिसीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन' (CDC) को इसे चिकित्सा जगत में दुनिया के लिए सबसे बड़ा मौजूदा खतरा घोषित करना पड़ा।

फेसबुक के साइंस टाइम पेज पर लिखा गया कि माउंट सिनाई में भर्ती मरीज तो 90 दिनों में मर गया, लेकिन 'कैंडिडा ऑरिस' नहीं मरा। जांच से पता चला कि यह कीटाणु (फंगस) उस मरीज के मरने के बाद भी कमरे में हर कहीं मौजूद था। उससे निपटने के लिए अस्पताल को विशेष सफाई उपकरणों की जरूरत पड़ी। इसके लिए उस कमरे की छत और फर्श की टाइलों तक को बदला गया।

अमेरिका के डिप्टी स्टेट एपिडेमियोलॉजिस्ट डॉ. लेनन सोसा का कहना है कि दवा प्रतिरोधी संक्रमणों (infections) में फिलवक्त 'कैंडिडा ऑरिस' सबसे बड़ा खतरा है। यह पूरी तरह पराजित होने वाला नहीं, इसे पहचानना भी बहुत मुश्किल है। ज्यादातर बड़े अस्पतालों के डॉक्टरों का कहना है कि इस बारे में लोगों को जागरूक करना बेहतर हो सकता है लेकिन कुल मिलाकर इससे लोगों में अस्पतालों को लेकर आतंक ही फैलेगा। यही वजह है कि इन्फेक्शन का पता चल जाने के बावजूद इसे छिपाया जाता है। 

इंपीरियल कॉलेज ऑफ़ लन्दन के फंगल एपिडेमियोलॉजी के प्रोफेसर मैथ्यू फिशर का कहना है कि दवा-प्रतिरोधी बैक्टीरिया और दवा-प्रतिरोधी फंगस का अस्तित्व में आना भीषण समस्या है। 2016 में यह मसला सन्युक्त राष्ट्र महासभा में उठ चुका है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि असरदार नई दवाएं नहीं बनाई गईं और मौजूदा दवाओं का दुरुपयोग नहीं रुका तो यह समस्या तेजी से बढ़ेगी और दुनिया की स्वस्थ आबादी के लिए भी खतरा पैदा हो जाएगा। ब्रिटिश सरकार द्वारा कराये गए एक शोध के मुताबिक यदि ड्रग रैजिस्टैंस की समस्या नहीं थमी तो 2050 तक हर साल इसी वजह से एक करोड़ लोग मरने लगेंगे।

यहां हमें याद रखना चाहिए कि माउंट सिनाई में जिस कैंडिडा ऑरिस से एक आदमी की मौत हुई थी वह उन बहुत सारे बैक्टीरिया या फंगसों में से महज एक है जिन्होंने ज्यादातर दवाओं के विरुद्ध प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर ली है। वाशिंगटन यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ़ मेडिसिन के ताजा आंकड़ों के मुताबिक अकेले अमेरिका में ही इस तरह के संक्रमण से हर साल 23,000 लोगों की मौत हो जाती है। 

यह जरूरी नहीं कि 'कैंडिडा ऑरिस' निश्चित तौर पर जान ही ले ले। अभी जो मामले अस्पतलों में पहुंचते हैं, वे सौ फीसदी ड्रग रेजिस्टैंट नहीं होते। CDC का आकलन है कि 'कैंडिडा ऑरिस' एक दवा के खिलाफ 90 फीसदी रेजिस्टैंट हो चुका है तो अन्य दो या तीन दवाओं के खिलाफ 30 फीसदी।

वैज्ञानिकों का मानना है कि खेती में बड़े पैमाने पर एंटीफंगल दवाओं के इस्तेमाल से ही उक्त दवा-प्रतिरोधी फंगस अस्तित्व में आया है। यदि हमें कैंडिडा ऑरिस जैसे प्रतिरोधी फंगस पर लगाम कसनी है तो सबसे पहले फंगसनाशी दवाओं का अवैज्ञानिक अंधाधुंध उपयोग रोकना होगा।         


Friday, March 22, 2019

भारत में कैसे निपटते हैं लोग मनोरोगों से !

 राजीव शर्मा

भारत में मनोरोग भीषण समस्या है। रोगियों की संख्या बढ़ रही है।  विश्व स्वास्थ्य संगठन का कुछ साल पहले आकलन था कि  2020 तक भारत में भारत की 20 प्रतिशत आबादी किसी न किसी मानसिक बीमारी की गिरफ्त में होगी। लेकिन इलाज करने वाले योग्य डॉक्टरों का भीषण अभाव तो है ही, इस मामले में जागरूकता की भी भारी कमी है। 
यदि ऐसा न होता तो मनोरोग के नब्बे फीसदी मामलों का समाधान तो बेहतर सामाजिक संबंधों से ही हो जाता। चिकित्सीय भाषा में इसे कॉउंसलिंग कहा जाता है। देखा गया है कि प्राइवेट अस्पतालों में लोग सीधे डॉक्टरों तक तो पहुंच जाते हैं लेकिन कॉउंसलर तक नहीं पहुंच पाते। इसकी वजह यह है कि जितनी फीस डॉक्टर लेता है, उतना ही चढ़ावा कॉउंसलर को भी चढ़ाना पड़ता है।

प्रशिक्षित डॉक्टरों के बजाय दिल्ली जैसे शहरों में भी तमाम जगह मनोरोगों का इलाज करने वाले ओझाओं के डेरे देखे जा सकते हैं। कोई झाड़-फूंक से इसका इलाज करता नज़र आता है तो कोई इसके लिए हवन कराने का सुझाव देता है। इस मामले में अंधविश्वासों का बोलबाला है। छोटे कस्बों और गांवों से तो ऐसी ख़बरें भी आती रहती हैं कि किसी मनोरोगी को प्रेत या डायन बताकर उसकी हत्या ही कर दी गई। ऐसे सामाजिक संगठन या सामाजिक कार्यकर्ता न के बराबर हैं जो ऐसे मामलों में मनोरोगियों का सही मार्गदर्शन कर सकें।

देश भर में अच्छे मानसिक स्वास्थ्य अस्पताल खोलने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं हुए हैं। देहाती इलाकों में बहुत बड़ी संख्या में मानसिक रोगी हैं। उनमें से बहुत लोगों की चिकित्सा ऐसे मंदिरों तक सीमित है जहां मनोरोगियों को जंजीरों से बांधकर रखा जाता है। हाल ही में यह खबर अख़बारों का हिस्सा बनी कि एक बड़े मंदिर से ऐसे बहुत सारे लोगों को आजाद कराया गया जिन्हें मनोरोग के नाम पर बांधकर रखा गया था। मनोरोगियों पर बढ़ते अत्याचारों को देखते हुए भारत में 2015 में नई मानसिक स्वास्थ्य नीति बनाई  गई।

इससे पहले आज़ाद भारत में पहला प्रयास 1987 में हुआ था लेकिन मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम, 1987 में अनेक कमियां थीं जिनकी वजह से यह कभी लागू नहीं हो पाया। इस अधिनियम की एक बड़ी कमी यह थी कि इसके अंतर्गत आत्महत्या की कोशिश धारा 309 के तहत दंडनीय जुर्म बना हुआ था। इसका सीधा-सीधा मतलब यह था कि यदि कोई मनोरोगी अपनी बीमारी की गंभीरता के चलते आत्महत्या जैसा प्रयास कर बैठे तो उसके बाद वह अस्पतालों के साथ अदालतों के भी चक्कर लगाने को मजबूर हो जाए। अब नई स्वास्थ्य नीति और अधिनियम में इसे अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया है।

मनोरोगियों के बारे में एक अजीब बात यह कि मनोरोगी का जब एक बार इलाज शुरू हो जाता है, तो वह पूरी तरह दूसरों पर निर्भर बना दिया जाता है। उसे हमेशा यही समझाया जाता है कि वह अपने या अपने इलाज के बारे में कोई निर्णय नहीं ले सकता। ऐसे में उससे और उसके परिवार के साथ इलाज के नाम पर कोई कितना भी खिलवाड़ कर सकता है। किसी परिवार में यदि कोई मानसिक रोगी होता है तो उससे भी घर के लोग शायद ही कभी इस बारे में चर्चा करते हों कि उसकी वास्तविक समस्या क्या है और परिवार खुद अपने स्तर पर उसकी क्या मदद कर सकता है। नई स्वास्थ्य नीति और अधिनियम में हालात को बदलने की कोशिश की गई है।

नई मानसिक स्वास्थ्य नीति के तहत मानसिक स्वाथ्य सेवा  अधिनियम, 2017 बनाया गया जो 29 मई, 2018 से लागू है। लेकिन इसको लागू करने का काम जिस अनमने ढंग से चल रहा है, उसे देखते हुए धरातल पर कोई परिवर्तन आने में सालों लग जाएंगे।